एक दिन…

हर शाम की तरह एक दिन तनहा हम बैठे थे,
दिल के लफ़्ज़ों को कागज़ पर उतरा करते थे.
ये सिलसिला मेरी तन्हाइयों तक सिमित था,
ख्याल मुझमे और चन्द कागज़ के टुकड़ों तक सिमित था.

जाने क्यों एक दिन पंख लगे ख्यालों को,
उड़ कर जा बैठा ऊँची शाखों पर.
कुछ दिखता धुन्दला दूर कहीं मुमकिन,
फिर खो गया हवाओं संग अपनी तन्हाइयो में लेकिन.

इस उड़ने की फितरत पर पड़ी नज़र किसी की,
मुझसे अनकही लेकिन औरों ने खूब सुनी थी.
उठा कर ख्याल को दिया नया रंग,
दिया नयी दुनिया कहा चल उड़ने को संग.

आज वो तनहा ख्याल तनहा ना रहा,
मिले संग कुछ हमखयाल, हमसफ़र बन चला.
अब दिलों के आवाज़ को लफ्ज़ मिल गए,
उसको पहचान दिलाने कुछ और भी संग चल पड़े.

A silent dedication to my motivators…

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