वो शाम

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वो शाम कुछ इतनी हसीन थी,
जब तुम लाये थे फूल मेरे लिए |
लाल गुलाबों का था वो गुलदस्ता,
चलता था ग़ज़लों का खूबसूरत सिलसिला |

हातों में लेकर हाथ मेरा,
थामा था बड़े प्यार से |
आँखों में सवाल कई थे तेरे,
होटों पर मुस्कान थी दबी दबी |

ना जाने क्यों आंखों में मेरी ख़ुशी भी थी,
गम का भी था साया |
जस्बातों के मेरे समझ कर,
तुमने अपने ख्वाबों को था दबाया |

शाम गुज़री, महफ़िल हुई मुकम्मल,
रात के सन्नाटे  में, तारो के साये में,
चल पड़े थे हम दो अजनबी बन कर |
ना उसने कुछ कहा ना मैंने कुछ पुछा,
चले थे दो दिल खामोश ज़िन्दगी के रेल पर |

दिन वो आखरी था, शाम भी थी आखिरी,
हवा कुछ सर्द थी, फिर भी कुछ गर्मी सी थी |
आखिरी बार समेटा उसने मुझे अपनी बाँहों के घेरे में,
खामोश, बेख़ौफ़  सिमट गयी मैं उनकी गहराइयो में |
फिर मिले ये पल कभी पता नहीं,
दो राह को ज़िन्दगी कर चली थी हमारे  |

ख्याल रखना तुम अपना, खुश रहना तुम सदा , 
दोनों के आँखे कहने लगी, दिल की अनकही सदा |
हम मिल ना सके इस जनम में गम नहीं,
पल तेरे संग बीते किसी ज़िन्दगी से कम नहीं |

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10 thoughts on “वो शाम

      1. Bilkul…
        kuch dabe dabe se armaan…
        kuch bhooli Hui kahaniyan,
        Kuch kisse adhure se
        Kuch hasratein
        Kuch khwaab bikhre hue
        Tune Aaj bhooli yaadon ko
        Hawa Kya di
        Mann ke taar jhanjhna uthe
        Dil ke saare taane baane
        Kuch Aisi bekhudi se gane lage
        Aafreen, Aafreen

        Liked by 1 person

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